Monday, July 26, 2010

चंद चिठियाँ ऐसी भी

एक बेटे के पिता के लिए

कैसे हो दोस्त. शायद हम एक दुसरे को नहीं जानते पर एक रिश्ता है जो जोड़ता है हमें एक दुसरे से.
शायद कल मेरी गुड़िया तुम्हारे घर की बिटिया बनेगी

कुछ कहना चाहता हूँ मैं तुमसे. तुम्हे सिर्फ इसलिए क्यूंकि तुम ही समझोगे
क्यूंकि मेरी तरह तुम भी एक पिता हो
तुम समजते हो कैसा लगता है जब वो नन्हा फ़रिश्ता आँखें खोलता है अपने पिता की गोद में. उसकी उम्मीद भरी अनकहें कुछ वादे मांग लेती है, वादे की ख्याल रखेंगे हम उसका.
कल जब वोह तुम्हारे घर आएगी.
भोली है बेचारी .
सब समझने में थोड़ी तो देर लगेगी.
उसे शायद मालूम न हो तुम्हारे घर के रीती रिवाज़.
हो सकता है कुछ वक़्त मांगे वो नए रंग में ढलने के लिए.
उसे मालूम न हो तुम्हारी पसंद और ना समझे वो जीने का नया ढंग

हो सकता है तुम्हारी बेटी की तरह वो भी कभी देर तक सो जाये
या कभी काम की परेशानियों के चलते घर देर से आये. समझा दूंगा उसे
हो सकता है उसे न मालूम
हो तुम्हारे रिश्तेदारों के नाम
हो सकता है मालूम न हो उसे घर के छोटे छोटे काम
समझा दूंगा उसे
कभी कभी रात को डर जाती है
कभी माँ के आँचल को पकड़ के सो जाती है
उसकी माँ उससे बहुत प्यार करती है
उसने सीचा है अपने शरीर में
यह रिश्ता तो भुलाये नहीं भूलता

हो सकता है उसे कभी माँ की याद सताए
कभी कभी वो उससे मिलने भी चली आये
तुम माफ़ कर देना उस माँ की गलती को
फिर भी समझा दूंगा उसे
हो सकता है उसका मन
करे सहेलियों से मिलने का
भाई के माथे को तिलक करने का
या बहन के हाथों को पकड़ घंटों बैठने का
दरअसल ये रिश्ते बहुत पुराने है
इन्हें भूलने की मोहलत तो दे दोगे ना

खेलना पसंद है उसको
फिर भी समझा देना अपने रीती रिवाज़ जरुर समझ जाएगी

कभी कभी गुस्सा हो जाती है मुझ पर भी
गुस्सा तो पागलपन है उसे पागल समझ के भुला तो दोगे ना

हर लड़की की तरह वो भी सपने देखती है
वो भी आएगी आपके घर
नया नाम, घर और नया वजूद अपनाने
सपनो को भूलने की मोहलत तो दे देगो न

पिता और बेटी का रिश्ता सबसे पवित्र रिश्ता है
हर पिता अपनी बेटी को अपने से ज्यादा चाहता है
मैं भी चाहता हूँ पर क्या करूँ थोडा डरपोक हूँ ना इसलिए खुल कर कह ना सका उससे
आप तो कह दोगे ना

जब देर आती है तो चिल्ला देता हूँ उस पर
दरअसल बता नहीं पता उसे की क्या है वो मेरे लिए
उसकी नन्ही उगलियों को पकड़ के चलना सिखाया है मैंने उसको
कैसे कहूं की मेरा हर सपना बंधा है उससे

पर जानता हूँ जब जाएगी इस आँगन से तो फूट फूट के रोऊँगा मैं
मैं तो बाप हूँ मेरा क्या है
उसे तो ढलने की मोहलत दे दोगे ना

आप तो बड़े है
नाराज भी होगे तो माफ़ तो कर दोगे ना

औलाद की कोई कीमत नहीं
इसकी कीमत कोई लगा भी नहीं सकता
फिर भी एक बाप के लिए अपनी सबसे कीमती दौलत खुद से जुदा करना कितना मुश्किल होगा
तुम जरुर समझोगे

फिर भी समझा दूंगा उसे

एक बेटी का पिता

its a letter from the book i intend to write
hope people like it
prince gera

6 comments:

  1. REALLY ITS HEART TOUCHING...
    IF ITS YOUR THOUGHTS THEN I SALUTE YOU Mr. GERA.

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  2. being a daughter i can just say that though fathers are not much xpressive, dey love their daughter more than their mother...
    and daughters too love their fathers very much
    thankyou sir for wonderful feelings xpressed thrugh this short poem...

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  3. Speech less sir...its really vry emotional,my tears hs cme after read this.

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  4. welll welll welll.....oh gosh wat do i say now either u have a magic wand or ur a charmer ...wat an amazing set of words ...trust me on this i have never read any piece which is so emotional and heartwhelming....i loved it completely hands down ....!!!!

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  5. oh God ...i never think so deep before.....overwhelm

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  6. Nice thought to explain the relationship between a father and his daughter....... so pure,so calm,so emotional.... a bond which never broken so easily in whole life..!!!!!

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