क्या आपने कभी मकान बनाने की सोची है?
चलो क्यों ना मकान बनाएं? क्या करें, दीवार खड़ी कर देते हैं , नहीं नहीं फर्श डालते हैं,
रुको क्यों न पहले पानी की फिटिंग कर लें,
ओह हो मकान तो बन गया पर अंदर कहाँ से जायें?
नहीं, मकान ऐसे नहीं बनते, इसके लिए नक्शा चाहिए.. नक्शा जो दिमांग में नहीं, कागज़ पे हो. क्यूंकि किसी का दिमाग पड़ना
अभी इतना आसान नहीं. और दीमाग पड़ने वाले का तरीका एक सा हो यह भी जरुरी नहीं.
सोचो फिल्में अगर बिना कहानी लिखे बने तो?
बड़ी बड़ी कंपनी बिना किसी प्लान के प्रोडक्ट बनाने लगे तो?
किसी दिन दोपहर को घर से निकल के देखो. एक दम साफ़ दिन, और उजाला. थोडा चलो, और फिर सोचो जाना कहाँ है?
तो वो सूरज भी फीका लगने लगेगा. क्यूंकि वो तुम्हारे मन का अँधेरा है.
और एक रात अँधेरे में निकलो, अपनी मंजिल का फैसला करके. देखो तुम्हारे मन की रौशनी कैसे चीर देगी उस अँधेरे को. क्यूंकि तुम्हें मालूम है की तुम्हे कहाँ जाना है?
किसी भी आदमी को देखो, किसी भी कंपनी को देखो...जिसने सफलता को छुआ है, उसकी सफलता के पीछे एक ही राज़ है...
एक सफल योजना, या यूँ कहें एक कि एक निर्धारित प्लान.
सफल लोग अपने प्लान कागज़ पे उतारते है.
एक मशहूर विश्वविद्यालय के प्रोफेस्सर से बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे बताया..
अक्सर फोन आता है मुझे, मेरे कुछ नए पुराने स्टुडेंट्स का.
सर
आपसे मिलना है?
हाँ हाँ क्यों नहीं? आ जाओ..वैसे किस विषय में मिलना है?
सर मेरे पास एक बिज़नस प्लान है ..आपसे राय लेना चाहता हूँ..
हाँ हाँ आ जाओ क्यों नहीं...एक बढ़िया से फाइल में लगा के ले आओ.
अरे नहीं सर, उस सबकी क्या जरुरत है..,मुझे सब याद है, मेरा ही तो प्लान है..
फिर भी, लिख लाओ तो बेहतर होगा...
ठीक है सर.
हम्म, जानते हैं क्या ?
९०% तो आते ही नहीं. कौन लिखे, कौन कागज़ काला करें?
अरे ऊपर वाला भी जब भेजता है तो तकदीर लिखता है, अपने हाथो से अपनी तकदीर लिखो से बुजुर्गो का शायद यही मतलब था.
दिशा ही आपकी दशा तय करेगी...
यदि अगर आप परेशान हैं तो पीछे मुड के दिखेये..आप यकीन से कह सकेंगे ..आपकी दिशा ही आपकी दशा के लिए जिम्मेदार है?
हम जिस भी हाल में होते है उसके जिम्मेदार सिर्फ हम खुद होते हैं....ऐसा कहा जाता है.
सही दिशा से मतलब है वो दिशा जो हमें हमारी मंजिल तक ले जाये..
मंजिल का रास्ता लिखने के लिए मंजिल का मालूम होना जरुरी है मेरे दोस्त..
आज क्यूँ ना थोडा वक़्त निकालें , तय करें अपनी मंजिल...
Monday, January 2, 2012
Wednesday, January 19, 2011
हर पति के लिए....
"ओ साथी रे"!
एक नज़र फेरु अगर गुज़रे हुए सालो क़ी तरफ
तो एहसास होता है क़ी कितना खुदगर्ज़ हूँ मै !
याद नही कितनी बार तुम्हारे
एहसानों के तले दबा हूँ मै !!
तुम आये हो मेरे साथी, मेरी जिंदगी सवारने !
तुम्हारी इस न खत्म होने वाली भाग- दौड़ में
मै तुम्हे बहुत कुछ कहना भूल गया था !
सोचता हूँ क़ी आज कह दूं , कहीं देर न हो जाए !!
सब कुछ छोड़कर नया नाम अपनाया तुमने
नया घर और नया जीवन अपनाया तुमने मेरे लिए !
सारी जिंदगी जिनके साथ खेली
उन्हें भुलाया मेरे लिए !
हर रोज़ सुबह उठती हो सबसे पहले
सारा दिन काम करना, थक कर गिरना और
फिर काम करना तुम्हारी आदत सी बन गयी है !
ऑफिस जाना और सब संभालना
और फिर सबकी जरूरतों को पूरा करना !
घर में कोई बीमार पड़े तो रात भर जागना,
अपनी भूख को परे रखकर पहले सबका पेट भरना !
कहाँ से आती है तुममे इतनी ताकत !
फिर भी तुम पर चिल्ला देता हूँ मै
सच, मुझ जैसा मतलबी तो कोई हो भी नही सकता !
तुम सालो जहाँ रही उसे पल भर में पराया कर
चली आई मेरा घर बसाने!
कभी ये भी नही सोचा मैंने कि
कितना वक़्त लगेगा तुमको !
अपनी उम्मीदों का बोझ तुमपर डालता रहा
और ये पूछना भी भूल गया तुमसे कि
क्या तुम्हारी भी कुछ उम्मीदे है मुझसे !
कहते है पति परमेश्वर होता है
पर मै तुम्हे क्या कहू !
अपनी आधी जिंदगी तुमने रसोई या दफ्तर में बिता दी
ताकि बाकी आधी हम ख़ुशी से बिता सके !
जिन रिश्तो कि समझ मुझे नही थी
उन्हें भी निभाया तुमने !
कभी मेरी बहन की सहेली बनकर
तो कभी माँ-बाप की बेटी बन कर !
कितनी बार बेइज्जती भी सहन कि सिर्फ मेरी खातिर,
फिर भी माफ़ कर दिया मेरी खातिर
किस मिटटी की बनी हो तुम !
बच्चो को संभालना किसी एक की जिम्मेदारी तो कभी न थी
फिर भी तुम ने उफ़ न की !
मेरे उपर काम का बोझ है ये ही कहकर तुमपर
चिल्लाने की छूट लेता रहा !
क्या तुम्हे कभी गुस्सा नही आता
क्या तुम्हारा बड़ा दिल कभी स्वार्थी नही बनता !
मेरे घर को तुमने अपनाया, इसे घर बनाया
पर भूल ही गया तुम्हारे माँ बाप को मै !
बेटी पराया धन है ये ही कहकर भुलावा देता रहा !
मेरे फैसले को अटल माना तुमने पर
क्या तुम्हारी समझ को कम मानना सही था !
मुझे अपनाने के लिए शुक्रिया साथी क्यूंकि,
कितनी ही कोशिश क्यूँ न करू, पर
तुम्हारे बिन अकेला हूँ मै..
अकेला ही नही, अधूरा हूँ मै !
सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक
खाने के पहले निवाले से लेकर पानी के घूँट तक
कर्ज़दार हूँ मै तुम्हारा !
सात फेरो की कसम खाई थी मैंने
मै तो शायद भूल गया, पर तुम नही भूली !
जाने अनजाने कभी तकरार हुई भी तो,
सब भुला दिया तुमने !
पहले ही दिन तुमसे मेरे घर को समझ लेने की
उम्मीद बाँध बैठा मै, और फिर तुम लगी रही
उस उम्मीद को पूरा करने में !
जब कहीं बाहर जाता तो साथ तुम्हारा साया जाता !
दोस्तों के साथ देर तक घूमना
सिर्फ मेरे लिए ही क्यूँ सही है !
ये सवाल क्यूँ नही पूछा तुमने?
मेरे माँ-बाप की तरह तुम्हारे माँ -बाप मेरे क्यूँ नही है !
काम करने की और इच्छाएं पूरी करने की
छूट मुझे ही क्यूँ मिलती है
कभी नही पूछा तुमने !
आज से वादा करता हूँ
तुम्हे अपनी अर्धान्गिनी सच में बनाऊंगा मै !
तुम्हारे सारे सपनो को रंगने की कोशिश करूँगा !
कोशिश करूँगा की तुम्हारी गलतियों को सिर्फ
गलती ही मानू और आगे बढ़ने की कोशिश करू
याद रखूँगा की मेरी तरह तुम भी
एक इन्सान हो !
वादा रहा अब तुम्हारी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी होगी !
बस एक बार उठ जाओ और माफ़ कर दो मुझे !
तुम्हारा चेहरा मुझे भूले नही भूलेगा !
और बाकी की जिंदगी मै इसी आग में जलूँगा कि
काश! मैंने वो कह दिया होता जो मैंने कहा नही तुमसे !
तो कम से कम आज तुम्हारी अर्थी को कंधा देते वक़्त
अपनी ही आँखों से नीचे गिरता न मै ....
from the book i intend to write
चंद चिट्ठियां ऐसी भी
prince gera
एक नज़र फेरु अगर गुज़रे हुए सालो क़ी तरफ
तो एहसास होता है क़ी कितना खुदगर्ज़ हूँ मै !
याद नही कितनी बार तुम्हारे
एहसानों के तले दबा हूँ मै !!
तुम आये हो मेरे साथी, मेरी जिंदगी सवारने !
तुम्हारी इस न खत्म होने वाली भाग- दौड़ में
मै तुम्हे बहुत कुछ कहना भूल गया था !
सोचता हूँ क़ी आज कह दूं , कहीं देर न हो जाए !!
सब कुछ छोड़कर नया नाम अपनाया तुमने
नया घर और नया जीवन अपनाया तुमने मेरे लिए !
सारी जिंदगी जिनके साथ खेली
उन्हें भुलाया मेरे लिए !
हर रोज़ सुबह उठती हो सबसे पहले
सारा दिन काम करना, थक कर गिरना और
फिर काम करना तुम्हारी आदत सी बन गयी है !
ऑफिस जाना और सब संभालना
और फिर सबकी जरूरतों को पूरा करना !
घर में कोई बीमार पड़े तो रात भर जागना,
अपनी भूख को परे रखकर पहले सबका पेट भरना !
कहाँ से आती है तुममे इतनी ताकत !
फिर भी तुम पर चिल्ला देता हूँ मै
सच, मुझ जैसा मतलबी तो कोई हो भी नही सकता !
तुम सालो जहाँ रही उसे पल भर में पराया कर
चली आई मेरा घर बसाने!
कभी ये भी नही सोचा मैंने कि
कितना वक़्त लगेगा तुमको !
अपनी उम्मीदों का बोझ तुमपर डालता रहा
और ये पूछना भी भूल गया तुमसे कि
क्या तुम्हारी भी कुछ उम्मीदे है मुझसे !
कहते है पति परमेश्वर होता है
पर मै तुम्हे क्या कहू !
अपनी आधी जिंदगी तुमने रसोई या दफ्तर में बिता दी
ताकि बाकी आधी हम ख़ुशी से बिता सके !
जिन रिश्तो कि समझ मुझे नही थी
उन्हें भी निभाया तुमने !
कभी मेरी बहन की सहेली बनकर
तो कभी माँ-बाप की बेटी बन कर !
कितनी बार बेइज्जती भी सहन कि सिर्फ मेरी खातिर,
फिर भी माफ़ कर दिया मेरी खातिर
किस मिटटी की बनी हो तुम !
बच्चो को संभालना किसी एक की जिम्मेदारी तो कभी न थी
फिर भी तुम ने उफ़ न की !
मेरे उपर काम का बोझ है ये ही कहकर तुमपर
चिल्लाने की छूट लेता रहा !
क्या तुम्हे कभी गुस्सा नही आता
क्या तुम्हारा बड़ा दिल कभी स्वार्थी नही बनता !
मेरे घर को तुमने अपनाया, इसे घर बनाया
पर भूल ही गया तुम्हारे माँ बाप को मै !
बेटी पराया धन है ये ही कहकर भुलावा देता रहा !
मेरे फैसले को अटल माना तुमने पर
क्या तुम्हारी समझ को कम मानना सही था !
मुझे अपनाने के लिए शुक्रिया साथी क्यूंकि,
कितनी ही कोशिश क्यूँ न करू, पर
तुम्हारे बिन अकेला हूँ मै..
अकेला ही नही, अधूरा हूँ मै !
सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक
खाने के पहले निवाले से लेकर पानी के घूँट तक
कर्ज़दार हूँ मै तुम्हारा !
सात फेरो की कसम खाई थी मैंने
मै तो शायद भूल गया, पर तुम नही भूली !
जाने अनजाने कभी तकरार हुई भी तो,
सब भुला दिया तुमने !
पहले ही दिन तुमसे मेरे घर को समझ लेने की
उम्मीद बाँध बैठा मै, और फिर तुम लगी रही
उस उम्मीद को पूरा करने में !
जब कहीं बाहर जाता तो साथ तुम्हारा साया जाता !
दोस्तों के साथ देर तक घूमना
सिर्फ मेरे लिए ही क्यूँ सही है !
ये सवाल क्यूँ नही पूछा तुमने?
मेरे माँ-बाप की तरह तुम्हारे माँ -बाप मेरे क्यूँ नही है !
काम करने की और इच्छाएं पूरी करने की
छूट मुझे ही क्यूँ मिलती है
कभी नही पूछा तुमने !
आज से वादा करता हूँ
तुम्हे अपनी अर्धान्गिनी सच में बनाऊंगा मै !
तुम्हारे सारे सपनो को रंगने की कोशिश करूँगा !
कोशिश करूँगा की तुम्हारी गलतियों को सिर्फ
गलती ही मानू और आगे बढ़ने की कोशिश करू
याद रखूँगा की मेरी तरह तुम भी
एक इन्सान हो !
वादा रहा अब तुम्हारी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी होगी !
बस एक बार उठ जाओ और माफ़ कर दो मुझे !
तुम्हारा चेहरा मुझे भूले नही भूलेगा !
और बाकी की जिंदगी मै इसी आग में जलूँगा कि
काश! मैंने वो कह दिया होता जो मैंने कहा नही तुमसे !
तो कम से कम आज तुम्हारी अर्थी को कंधा देते वक़्त
अपनी ही आँखों से नीचे गिरता न मै ....
from the book i intend to write
चंद चिट्ठियां ऐसी भी
prince gera
एक ख़त बेटे के नाम
मेरे बच्चे !
नन्हे से तुम्हारे हाथो को पकड़ कर मैंने चलना सिखाया तुम्हे !
खुद को कितना ही बड़ा क्यूँ न मानू मै !
पर बहुत छोटा हूँ उस खुदा के सामने मै !!
मुझे तो ये भी नहीं पता था की कब आओगे तुम इस दुनिया मे !
क्या होगा तुम्हारा चेहरा और कैसा होगा तुम्हारा रंग रूप !
कौन सा दिन चुनोगे तुम और कितने साल रहोगे मेरे पास !
कब बीमार पड़ोगे तुम और कितनी साँसे भरोगे तुम !
क्या बनोगे तुम और क्या-क्या करोगे तुम !
कब बीमार पड़ोगे तुम और कब खुलकर हसोगे तुम !
कुछ भी तो नही पता था सिवाए
एक हाड मांस के शरीर के कुछ भी तो नही दे सकता था मैं !
फिर भी एक सुंदर,बेहतरीन आत्मा ने मेरे घर को चुना !
मैंने तुम्हे अपना बेटा कहा !
और फिर शुरू हुआ मेरा तुम पे अपना हक ज़माने का सिलसिला !
क्या पहनोगे तुम क्या नाम होगा तुम्हारा !
कैसे पढोगे तुम हर फैसला मै
ही लेने लगा !
खाने की टेबल पर तुम्हे बैठने के लिए टोकने लगा !
कपडे गंदे करने पर डांटता रहा !
तुम चुप चाप सहते रहे !
अनजाने में हुई तुम्हारी गलतियों की कितनी निंदा की मैंने !
जैसे खुद तो भगवान् बन गया था मै !
तुम्हारे मासूम दिल को कितनी बार चोट पहुचाई मैंने !
तुम क्या बनोगे ये भी मै ही तय करता गया !
तुम फिर भी खामोश रहे !
तुम्हारा सोने का दिल और वो बेहतरीन आत्मा !
मुझसे फिर भी बेमतलब प्यार करती रही !
मै तुम पर हक जमाता रहा भूल गया की
तुम पहले तो एक आत्मा ही होना !
जिसने अपनी इच्छा से बिना किसी शर्त के मुझे चुना !
मेरे घर को रौशन किया !
पर मै तुम्हारी तुलना सबसे कर तुम्हे नीचा दिखाता रहा !
कभी तुमने तो नही की मेरी तुलना और अगर करी भी
तो तुम्हे तुलना करना मैंने ही सिखाया !
आत्मा स्वतंत्र है फिर भी
अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए तुम्हे अपनी उम्मीदों में कैद करता रहा !
जिसकी प्रवति ही आज़ाद हो उसे मै कैसे कैद कर सकता था !
तुम्हारा मासूम चेहरा मेरी आँखों के सामने आ रहा है !
वो मुझे पूछ रहा है कि
क्या इसलिए मै तुम्हे दुनिया में लाया था !
तुमने मुझे चुना !
मैंने वादा किया था तुम्हे निस्वार्थ प्यार देने का !
पर तुमसे स्वार्थी होकर प्यार करता रहा !
कल ही कि तो बात है जब तुमने
अपनी माँ कि गोद में आँखे खोली थी , कब तुमने चलना शुरू कर दिया और
कब मेरे कंधे के बराबर आ गए तुम !
अपने डरो को तुम पर थोपता रहा !
गुस्से में तुम्हे क्या नही कहा !
पर फिर भी बहुत चाहता हूँ तुम्हे !
तुम्हे खोने के डर से सहम जाता हूँ मै !
पर फिर भी वादा करता हूँ अब तुम्हारा सच्चा दोस्त बनूँगा !
गलती भी करोगे तो ये ही समझूंगा कि अभी छोटा है !
तुम्हे आज़ादी दूंगा जीने क़ी और दूंगा अपने पूरा वक़्त
ताकि सही और गलत क़ी परख करना सिखा सकू !
ताकि इस अंधी दौड़ में एक नन्ही आत्मा को खो न दूं
दूंगा तुम्हे बेहतरीन अवसर अपने मकसद को पाने का !
एक बेहतर कल पाने का
इस समाज में बेहतर इंसान बनने का !
अब चाहे तुम कुछ बनो या न बनो
एक बेहतरीन इन्सान जरुर बनना और इसके लिए
जो बन सकेगा वो करूँगा मै !
अब अपनी इच्छाओ और आशाओ का बोझ
तुमसे उतारता हूँ मै और
अपना लो फिर से मुझे
उन्ही नन्हे हाथो और साफ़ दिल से !!
ताकि फिर कभी एक पिता इस तरह शर्मिंदा न हो....
तुम्हारा पिता
चंद चिट्ठियां ऐसी भी...prince gera
नन्हे से तुम्हारे हाथो को पकड़ कर मैंने चलना सिखाया तुम्हे !
खुद को कितना ही बड़ा क्यूँ न मानू मै !
पर बहुत छोटा हूँ उस खुदा के सामने मै !!
मुझे तो ये भी नहीं पता था की कब आओगे तुम इस दुनिया मे !
क्या होगा तुम्हारा चेहरा और कैसा होगा तुम्हारा रंग रूप !
कौन सा दिन चुनोगे तुम और कितने साल रहोगे मेरे पास !
कब बीमार पड़ोगे तुम और कितनी साँसे भरोगे तुम !
क्या बनोगे तुम और क्या-क्या करोगे तुम !
कब बीमार पड़ोगे तुम और कब खुलकर हसोगे तुम !
कुछ भी तो नही पता था सिवाए
एक हाड मांस के शरीर के कुछ भी तो नही दे सकता था मैं !
फिर भी एक सुंदर,बेहतरीन आत्मा ने मेरे घर को चुना !
मैंने तुम्हे अपना बेटा कहा !
और फिर शुरू हुआ मेरा तुम पे अपना हक ज़माने का सिलसिला !
क्या पहनोगे तुम क्या नाम होगा तुम्हारा !
कैसे पढोगे तुम हर फैसला मै
ही लेने लगा !
खाने की टेबल पर तुम्हे बैठने के लिए टोकने लगा !
कपडे गंदे करने पर डांटता रहा !
तुम चुप चाप सहते रहे !
अनजाने में हुई तुम्हारी गलतियों की कितनी निंदा की मैंने !
जैसे खुद तो भगवान् बन गया था मै !
तुम्हारे मासूम दिल को कितनी बार चोट पहुचाई मैंने !
तुम क्या बनोगे ये भी मै ही तय करता गया !
तुम फिर भी खामोश रहे !
तुम्हारा सोने का दिल और वो बेहतरीन आत्मा !
मुझसे फिर भी बेमतलब प्यार करती रही !
मै तुम पर हक जमाता रहा भूल गया की
तुम पहले तो एक आत्मा ही होना !
जिसने अपनी इच्छा से बिना किसी शर्त के मुझे चुना !
मेरे घर को रौशन किया !
पर मै तुम्हारी तुलना सबसे कर तुम्हे नीचा दिखाता रहा !
कभी तुमने तो नही की मेरी तुलना और अगर करी भी
तो तुम्हे तुलना करना मैंने ही सिखाया !
आत्मा स्वतंत्र है फिर भी
अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए तुम्हे अपनी उम्मीदों में कैद करता रहा !
जिसकी प्रवति ही आज़ाद हो उसे मै कैसे कैद कर सकता था !
तुम्हारा मासूम चेहरा मेरी आँखों के सामने आ रहा है !
वो मुझे पूछ रहा है कि
क्या इसलिए मै तुम्हे दुनिया में लाया था !
तुमने मुझे चुना !
मैंने वादा किया था तुम्हे निस्वार्थ प्यार देने का !
पर तुमसे स्वार्थी होकर प्यार करता रहा !
कल ही कि तो बात है जब तुमने
अपनी माँ कि गोद में आँखे खोली थी , कब तुमने चलना शुरू कर दिया और
कब मेरे कंधे के बराबर आ गए तुम !
अपने डरो को तुम पर थोपता रहा !
गुस्से में तुम्हे क्या नही कहा !
पर फिर भी बहुत चाहता हूँ तुम्हे !
तुम्हे खोने के डर से सहम जाता हूँ मै !
पर फिर भी वादा करता हूँ अब तुम्हारा सच्चा दोस्त बनूँगा !
गलती भी करोगे तो ये ही समझूंगा कि अभी छोटा है !
तुम्हे आज़ादी दूंगा जीने क़ी और दूंगा अपने पूरा वक़्त
ताकि सही और गलत क़ी परख करना सिखा सकू !
ताकि इस अंधी दौड़ में एक नन्ही आत्मा को खो न दूं
दूंगा तुम्हे बेहतरीन अवसर अपने मकसद को पाने का !
एक बेहतर कल पाने का
इस समाज में बेहतर इंसान बनने का !
अब चाहे तुम कुछ बनो या न बनो
एक बेहतरीन इन्सान जरुर बनना और इसके लिए
जो बन सकेगा वो करूँगा मै !
अब अपनी इच्छाओ और आशाओ का बोझ
तुमसे उतारता हूँ मै और
अपना लो फिर से मुझे
उन्ही नन्हे हाथो और साफ़ दिल से !!
ताकि फिर कभी एक पिता इस तरह शर्मिंदा न हो....
तुम्हारा पिता
चंद चिट्ठियां ऐसी भी...prince gera
Friday, November 26, 2010
SORRY TO ALL
hi everyone
a big sorry to everyone for following reasons.
1. i have pathetic writing skills so a lot of people feel bad with my grammar. as suggested my someone i should take up a short course on english writing. i am considering that and soon i will correct myself. thought the purspose of the blog is to ventilate my thoughts i has no intention to pass judgements or criticise anyone.
2. some content on the page was also taken from some webpages for the purspose of knowledge sharing. those pages have been deleted so now the content is all genuine.(yes with poor grammar)
3.i have not been able to upload anything for quite a long as i was busy with some assignments. i insist people to share their thoughts on the blog so that other can also enjoy that.
4.the blog is just to be in touch with my knowns and loved ones and has no other purpose to dominate or rule over someones thoughts or feelings.
regards
:-)
a big sorry to everyone for following reasons.
1. i have pathetic writing skills so a lot of people feel bad with my grammar. as suggested my someone i should take up a short course on english writing. i am considering that and soon i will correct myself. thought the purspose of the blog is to ventilate my thoughts i has no intention to pass judgements or criticise anyone.
2. some content on the page was also taken from some webpages for the purspose of knowledge sharing. those pages have been deleted so now the content is all genuine.(yes with poor grammar)
3.i have not been able to upload anything for quite a long as i was busy with some assignments. i insist people to share their thoughts on the blog so that other can also enjoy that.
4.the blog is just to be in touch with my knowns and loved ones and has no other purpose to dominate or rule over someones thoughts or feelings.
regards
:-)
Monday, November 22, 2010
for vijay
this one is for you vijay.
i had not been uploading anything for a long.
manoj spoke about you so thought of writing this congratulation note for you.
a ton of wishes for you and have a wonderful life ahead dear.
and yes congratulations for your new car.i am sure i will get a ride very soon.
i should be writing something very soon.
glad you people read the blog i thought i have become a thing of past.
lots of love
regards
prince gera
i had not been uploading anything for a long.
manoj spoke about you so thought of writing this congratulation note for you.
a ton of wishes for you and have a wonderful life ahead dear.
and yes congratulations for your new car.i am sure i will get a ride very soon.
i should be writing something very soon.
glad you people read the blog i thought i have become a thing of past.
lots of love
regards
prince gera
Friday, September 24, 2010
unforgettables
it was 7 in the morning when my phone buzzed. it doesnt really buzzes but i thought may be its somebody from the batch and must have called to confirm my arrival.
renu..it was...i thought for a few seconds what could it be?
a chill ran down my spine the moment i heard the line "sir, neeraj from morning batch has passed away"
what life is?
the young,chirping and one of the most keen learner from the batch who just started his life left everyone in between.
it was one of the most painful funerals i had ever attended.
how could this happen. what destiny wants?
i still remember, its merely a month before i had moved out to market for somework.
a young cute neeraj approached me with a smile and requested me to have a glass of juice that he had ordered for me. he ordered a glass of juice the moment he saw me.
i wonder how did he develop such courtesy.
how can we afford to fight with each other. when life has such an abrupt ending.
why cant we just remain together and happy.
regards
prince gera
renu..it was...i thought for a few seconds what could it be?
a chill ran down my spine the moment i heard the line "sir, neeraj from morning batch has passed away"
what life is?
the young,chirping and one of the most keen learner from the batch who just started his life left everyone in between.
it was one of the most painful funerals i had ever attended.
how could this happen. what destiny wants?
i still remember, its merely a month before i had moved out to market for somework.
a young cute neeraj approached me with a smile and requested me to have a glass of juice that he had ordered for me. he ordered a glass of juice the moment he saw me.
i wonder how did he develop such courtesy.
how can we afford to fight with each other. when life has such an abrupt ending.
why cant we just remain together and happy.
regards
prince gera
Monday, September 20, 2010
a small trick
everytime you feel low. angry, frustated or even annoyed at something.
just try this line..
hear what comes from you. it could be something like..what a shit..
or kya traffic jam again...or whatever
just repeat the same line in a qawalli format(sing this line in your mind as if you are singing a qawalli) and add WAH WAH at the end.
then see the difference.
regards
prince gera
just try this line..
hear what comes from you. it could be something like..what a shit..
or kya traffic jam again...or whatever
just repeat the same line in a qawalli format(sing this line in your mind as if you are singing a qawalli) and add WAH WAH at the end.
then see the difference.
regards
prince gera
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