"ओ साथी रे"!
एक नज़र फेरु अगर गुज़रे हुए सालो क़ी तरफ
तो एहसास होता है क़ी कितना खुदगर्ज़ हूँ मै !
याद नही कितनी बार तुम्हारे
एहसानों के तले दबा हूँ मै !!
तुम आये हो मेरे साथी, मेरी जिंदगी सवारने !
तुम्हारी इस न खत्म होने वाली भाग- दौड़ में
मै तुम्हे बहुत कुछ कहना भूल गया था !
सोचता हूँ क़ी आज कह दूं , कहीं देर न हो जाए !!
सब कुछ छोड़कर नया नाम अपनाया तुमने
नया घर और नया जीवन अपनाया तुमने मेरे लिए !
सारी जिंदगी जिनके साथ खेली
उन्हें भुलाया मेरे लिए !
हर रोज़ सुबह उठती हो सबसे पहले
सारा दिन काम करना, थक कर गिरना और
फिर काम करना तुम्हारी आदत सी बन गयी है !
ऑफिस जाना और सब संभालना
और फिर सबकी जरूरतों को पूरा करना !
घर में कोई बीमार पड़े तो रात भर जागना,
अपनी भूख को परे रखकर पहले सबका पेट भरना !
कहाँ से आती है तुममे इतनी ताकत !
फिर भी तुम पर चिल्ला देता हूँ मै
सच, मुझ जैसा मतलबी तो कोई हो भी नही सकता !
तुम सालो जहाँ रही उसे पल भर में पराया कर
चली आई मेरा घर बसाने!
कभी ये भी नही सोचा मैंने कि
कितना वक़्त लगेगा तुमको !
अपनी उम्मीदों का बोझ तुमपर डालता रहा
और ये पूछना भी भूल गया तुमसे कि
क्या तुम्हारी भी कुछ उम्मीदे है मुझसे !
कहते है पति परमेश्वर होता है
पर मै तुम्हे क्या कहू !
अपनी आधी जिंदगी तुमने रसोई या दफ्तर में बिता दी
ताकि बाकी आधी हम ख़ुशी से बिता सके !
जिन रिश्तो कि समझ मुझे नही थी
उन्हें भी निभाया तुमने !
कभी मेरी बहन की सहेली बनकर
तो कभी माँ-बाप की बेटी बन कर !
कितनी बार बेइज्जती भी सहन कि सिर्फ मेरी खातिर,
फिर भी माफ़ कर दिया मेरी खातिर
किस मिटटी की बनी हो तुम !
बच्चो को संभालना किसी एक की जिम्मेदारी तो कभी न थी
फिर भी तुम ने उफ़ न की !
मेरे उपर काम का बोझ है ये ही कहकर तुमपर
चिल्लाने की छूट लेता रहा !
क्या तुम्हे कभी गुस्सा नही आता
क्या तुम्हारा बड़ा दिल कभी स्वार्थी नही बनता !
मेरे घर को तुमने अपनाया, इसे घर बनाया
पर भूल ही गया तुम्हारे माँ बाप को मै !
बेटी पराया धन है ये ही कहकर भुलावा देता रहा !
मेरे फैसले को अटल माना तुमने पर
क्या तुम्हारी समझ को कम मानना सही था !
मुझे अपनाने के लिए शुक्रिया साथी क्यूंकि,
कितनी ही कोशिश क्यूँ न करू, पर
तुम्हारे बिन अकेला हूँ मै..
अकेला ही नही, अधूरा हूँ मै !
सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक
खाने के पहले निवाले से लेकर पानी के घूँट तक
कर्ज़दार हूँ मै तुम्हारा !
सात फेरो की कसम खाई थी मैंने
मै तो शायद भूल गया, पर तुम नही भूली !
जाने अनजाने कभी तकरार हुई भी तो,
सब भुला दिया तुमने !
पहले ही दिन तुमसे मेरे घर को समझ लेने की
उम्मीद बाँध बैठा मै, और फिर तुम लगी रही
उस उम्मीद को पूरा करने में !
जब कहीं बाहर जाता तो साथ तुम्हारा साया जाता !
दोस्तों के साथ देर तक घूमना
सिर्फ मेरे लिए ही क्यूँ सही है !
ये सवाल क्यूँ नही पूछा तुमने?
मेरे माँ-बाप की तरह तुम्हारे माँ -बाप मेरे क्यूँ नही है !
काम करने की और इच्छाएं पूरी करने की
छूट मुझे ही क्यूँ मिलती है
कभी नही पूछा तुमने !
आज से वादा करता हूँ
तुम्हे अपनी अर्धान्गिनी सच में बनाऊंगा मै !
तुम्हारे सारे सपनो को रंगने की कोशिश करूँगा !
कोशिश करूँगा की तुम्हारी गलतियों को सिर्फ
गलती ही मानू और आगे बढ़ने की कोशिश करू
याद रखूँगा की मेरी तरह तुम भी
एक इन्सान हो !
वादा रहा अब तुम्हारी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी होगी !
बस एक बार उठ जाओ और माफ़ कर दो मुझे !
तुम्हारा चेहरा मुझे भूले नही भूलेगा !
और बाकी की जिंदगी मै इसी आग में जलूँगा कि
काश! मैंने वो कह दिया होता जो मैंने कहा नही तुमसे !
तो कम से कम आज तुम्हारी अर्थी को कंधा देते वक़्त
अपनी ही आँखों से नीचे गिरता न मै ....
from the book i intend to write
चंद चिट्ठियां ऐसी भी
prince gera
Wednesday, January 19, 2011
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really very nice .....keep it up......!!!
ReplyDelete..deep thoughts again!
ReplyDeletevery nice Sir..
_vivek
its very wonderful sir.....
ReplyDelete-Gurpreet
awesome man.
ReplyDeletethis is as good as it could be. how do you write such a fantastic letter sir? i hope those who have problems in their marriage life can learn from this.
keep it up and all the best sir
...Hello Sir
ReplyDeleteWhy are you not posting !?
_Vivek