Wednesday, January 19, 2011

एक ख़त बेटे के नाम

मेरे बच्चे !
नन्हे से तुम्हारे हाथो को पकड़ कर मैंने चलना सिखाया तुम्हे !
खुद को कितना ही बड़ा क्यूँ न मानू मै !
पर बहुत छोटा हूँ उस खुदा के सामने मै !!
मुझे तो ये भी नहीं पता था की कब आओगे तुम इस दुनिया मे !
क्या होगा तुम्हारा चेहरा और कैसा होगा तुम्हारा रंग रूप !
कौन सा दिन चुनोगे तुम और कितने साल रहोगे मेरे पास !
कब बीमार पड़ोगे तुम और कितनी साँसे भरोगे तुम !
क्या बनोगे तुम और क्या-क्या करोगे तुम !
कब बीमार पड़ोगे तुम और कब खुलकर हसोगे तुम !
कुछ भी तो नही पता था सिवाए
एक हाड मांस के शरीर के कुछ भी तो नही दे सकता था मैं !
फिर भी एक सुंदर,बेहतरीन आत्मा ने मेरे घर को चुना !
मैंने तुम्हे अपना बेटा कहा !
और फिर शुरू हुआ मेरा तुम पे अपना हक ज़माने का सिलसिला !
क्या पहनोगे तुम क्या नाम होगा तुम्हारा !
कैसे पढोगे तुम हर फैसला मै
ही लेने लगा !
खाने की टेबल पर तुम्हे बैठने के लिए टोकने लगा !
कपडे गंदे करने पर डांटता रहा !
तुम चुप चाप सहते रहे !
अनजाने में हुई तुम्हारी गलतियों की कितनी निंदा की मैंने !
जैसे खुद तो भगवान् बन गया था मै !
तुम्हारे मासूम दिल को कितनी बार चोट पहुचाई मैंने !
तुम क्या बनोगे ये भी मै ही तय करता गया !
तुम फिर भी खामोश रहे !
तुम्हारा सोने का दिल और वो बेहतरीन आत्मा !
मुझसे फिर भी बेमतलब प्यार करती रही !
मै तुम पर हक जमाता रहा भूल गया की
तुम पहले तो एक आत्मा ही होना !
जिसने अपनी इच्छा से बिना किसी शर्त के मुझे चुना !
मेरे घर को रौशन किया !
पर मै तुम्हारी तुलना सबसे कर तुम्हे नीचा दिखाता रहा !
कभी तुमने तो नही की मेरी तुलना और अगर करी भी
तो तुम्हे तुलना करना मैंने ही सिखाया !
आत्मा स्वतंत्र है फिर भी
अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए तुम्हे अपनी उम्मीदों में कैद करता रहा !
जिसकी प्रवति ही आज़ाद हो उसे मै कैसे कैद कर सकता था !
तुम्हारा मासूम चेहरा मेरी आँखों के सामने आ रहा है !
वो मुझे पूछ रहा है कि
क्या इसलिए मै तुम्हे दुनिया में लाया था !
तुमने मुझे चुना !
मैंने वादा किया था तुम्हे निस्वार्थ प्यार देने का !
पर तुमसे स्वार्थी होकर प्यार करता रहा !
कल ही कि तो बात है जब तुमने
अपनी माँ कि गोद में आँखे खोली थी , कब तुमने चलना शुरू कर दिया और
कब मेरे कंधे के बराबर आ गए तुम !
अपने डरो को तुम पर थोपता रहा !
गुस्से में तुम्हे क्या नही कहा !
पर फिर भी बहुत चाहता हूँ तुम्हे !
तुम्हे खोने के डर से सहम जाता हूँ मै !
पर फिर भी वादा करता हूँ अब तुम्हारा सच्चा दोस्त बनूँगा !
गलती भी करोगे तो ये ही समझूंगा कि अभी छोटा है !
तुम्हे आज़ादी दूंगा जीने क़ी और दूंगा अपने पूरा वक़्त
ताकि सही और गलत क़ी परख करना सिखा सकू !
ताकि इस अंधी दौड़ में एक नन्ही आत्मा को खो न दूं
दूंगा तुम्हे बेहतरीन अवसर अपने मकसद को पाने का !
एक बेहतर कल पाने का
इस समाज में बेहतर इंसान बनने का !
अब चाहे तुम कुछ बनो या न बनो
एक बेहतरीन इन्सान जरुर बनना और इसके लिए
जो बन सकेगा वो करूँगा मै !
अब अपनी इच्छाओ और आशाओ का बोझ
तुमसे उतारता हूँ मै और
अपना लो फिर से मुझे
उन्ही नन्हे हाथो और साफ़ दिल से !!
ताकि फिर कभी एक पिता इस तरह शर्मिंदा न हो....
तुम्हारा पिता
चंद चिट्ठियां ऐसी भी...prince gera

9 comments:

  1. its awesome sir & it shows that how much a father loves to his son

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  2. This is Beautiful....as it is Real n very very true,Thanks for dis Poem.

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  3. ..this is why 'm a fan of yours..!

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  4. realy u r great sir....its too good...

    -Gurpreet

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  5. you know sir when i was in first semester i met a person dressed up so simple. he came and said "Hi guys. i am PRINCE GERA." At that very moment mujhe pta chal gya tha k you will rock tha world one day.You are on ur way sir.
    Awesome writing sir. jitna likhunga utna km hai

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  6. very truly.. words are so rare to define u sir.u have a magic to change anyone's life.we are lucky that we got a teacher like you in our life.

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  7. ..'m waitin' for your post Sir
    You seemed to be off..

    _Vivek aka Vivi!

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